बाढ़ के प्रवाह से
उफनती नदी
किनारों से कहती है
मैं प्यासी हूँ
किनारे नहीं मिलते
आपस में
नदी की प्यास बुझाने
हमेशा की तरह
सुना है उनकी आवाज
वेगवान पानी को थामने का
असफल प्रयास करने वाली
स्थिर शिलाओं के शोर में
डूब जाती है
नदी सदियों से प्यासी है।
अपने उद्गम से ही
पुकारती है नदी
मुँह फाड़े गौमुख को
जहाँ से प्रस्फुटित धारा की लय में
गुम हो गई है
नदी की पुकार
नदी ने गुहार लगाई
ऊँचे पहाड़ों को
जिनके बीच उसकी गुहार
आज भी प्रतिध्वनित हो रही है
नदी सदियों से प्यासी है।
कल कल करती
अभिशप्त नदी
सागर तक जा पहुँची

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