Sunday, March 24, 2019

गौरैया-2

उड़ती हुई गौरैया
चली आती है
हमेशा की तरह
मेरे जेहन मे
चिड़ची करती
मन के कोने पर बैठ
अपने अक्स पर बार-बार चोंच मारती
चिल्ला-चिल्ला कर कहती मुझसे
निकल जाओ यहाँ सिर्फ में रहूँगी
तुम्हारे जैसे
अस्थिर अन्तर्मन की मुझे जरूरत नहीं है।

गौरैया-१

मैं हाथों में गांडीव ले
रूपसी द्रोपदी के लिए
प्रत्यंचा चढ़ा
घूमती मछली की
आँख बेधनेवाला
पार्थ नहीं था।
न ही
शब्दवेधी बाणों से
भौंकते श्वान का मुँह
भरनेवाला साधनारत एकलव्य
फिर मेरी गुलेल से छूटा पत्थर
तुम्हें कैसे लगा गौरैया?
तुम अब नहीं हो
कोई उत्तर भी नहीं है
मैं जानता हूं
तुम्हारे और मौत के बीच
मैं, गुलेल व पत्थर ही तो थे
मेरा मन मुझे
माफ नहीं कर रहा
मैं प्रायश्चित करना चाहता हूँ।

सिलसिला

क्योंकर लिखते हैं लोग
नारी के शृंगार पर
कल्पना के सागर में
गोते लगाते हुए
खोज लाते हैं,
तरह-तरह के अलंकरण,
रत्नाभूषण पहनाकर
शब्दों में बुन देते हैं
नारी का प्यार
भूल जाते हैं उसकी ममता
खो जाता है माँ का वात्सल्य
पीछे रह जाती है
बेबस मजबूरी
सामने रहता है वर्णन
नारी के अंग-प्रत्यंगों का
उनसे अछूती रह जाती हैं,
सिरबोझा ढोती
लकड़ी बेचकर पैसा पाने वाली
हाट बाजार करती
दलित मजदूरिन
जो मोल-भाव में कम पाती
क्रय करती अपनी आवश्यकता
ऊँचे भावों पर
दोनों ओर लुटी जाकर घर जाती
फिर अगला सप्ताह, अगला हाट
हर बार यही सिलसिला।

वेलजी

नदी बहा ले गई थी
वेलजी[1] को पिछली जुलाई में
अपने साथ माही[2] से मिलाने,
मई के नवतपा में
माही आज ठहर गई है
गैमन पुल के नीचे सुस्ताने
दबा होगा वेलजी
यहीं-कहीं सूखी गाद में
औंधे मुँह,
हाथ ऊपर किए
अटका होगा उसका हाथ
खरबूजे के खेत तैयार करते हल में
लाश!
अब खाद में तब्दील हो चुकी होगी
खूब फलेगा खरबूजा

या फिर

खा गई होंगी बड़ी-मोटी मछलियाँ
उसका माँस
नोंच-नोंच कर
रेत में दफन हुई होंगी
बची-खुची हड्डियाँ
मेरे सामने यहाँ पुल के बायीं ओर
बिक रही हैं
कटी, तुली, भुनी वही मछलियाँ
जिनके माँस में
वेलजी का माँस भी मिल गया है।

दर्द

दरख्तों की मानिन्द
देखता रहा मैं
वहशी दरिन्दों के हाथों
अपनी ही छाया में
किसी बेबस अबला को लुटते
इच्छाशक्ति के अभाव में
कुछ भी नहीं कर पाया मैं
और जख्म खाए दरख्त की तरह
केवल अपना ही दर्द सहता रहा।

ओ कजरवारा की मोना!

ओ कजरवारा की मोना!
तुम मरीं
भूख से
बुखार से
कुत्ता काटने से
उपेक्षा से
या अपनी अभिरक्षा से
वंचित हो मरीं,
व्यथित हो मरीं
क्या तुम नहीं जानतीं?
गरीब-गुरबा मरते हैं
झुलसती गर्मियों में लू से
कड़कड़ाती ठण्ड में शीत से
बरसात में बाढ़ से
गाज गिरने से
मौका लगे तो
दूसरों की लगाई आग से
इलाज के अभाव में
बीमारी से, पर
खाने को जब तक होती हैं
हवा, घास, भीख या रहम
तब तक गरीब नहीं मरते
कभी भूख से
ओ मोना!

कजरवारा में तो
दावों-प्रतिदावों के बीच
यह सब था
फिर तुम मरीं क्यों?
शासन नहीं कहता
तुम्हारी लाश उखाड़े बिना
बिना चीरफाड़ किए
तुम्हें भूख ने मारा
बुखार ने मारा
अभाव ने मारा, या
मौत ने मारा
ओ मोना!
तुम मरीं क्यों?

तुम्हारी प्रत्याकृति

तुम्हारी आँखों में
मुझे एक प्रतिकृति
दिखाई देती है वसुधा!
धुँधली-सी
खोई-खोई या
किसी विचार में डूबी
अपनी बड़ी हो चुकी
बेटी की चिन्ता में लीन
चेहरा-सा लगता है
थका-थका
पीला पड़ता चेहरा
नहीं-नहीं
रक्त की कमी नहीं है
शायद चिन्ता ने
तनाव पैदा कर
तुम्हारे चेहरे को
मलिन किया है,
उस पर आँखें डूबी-डूबी-सी
शून्य में निहारतीं
खोजती नजरें किसी
अनुत्तरित प्रश्न के उत्तर को
जा टिकती हैं क्षितिज पर
जहाँ जमीं-आसमाँ के मिलन का
भ्रम-सा होता है, परन्तु
प्रश्न फिर भी अनुत्तरित है।

स्याह पड़ती साँय
तुम्हारी आँखों में
उस आकृति को पहचानने की
असम्भव कोशिश की मैंने वसुधा!
और तुम्हारे प्रश्नों के ढेर में
एक प्रश्न और छोड़ दिया
कहीं वह आकृति जो
तुम्हारी आँखों में है
तुम्हारी ही
प्रत्याकृति तो नहीं है?
ठीक तुम्हारी ही तरह वसुधा!